देश के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के परिवार में जारी दंगल थमने का नाम नही ले रहा अब तक 5 बार से ज़्यादा बार कोशिश की जा चुकी है परिवार में जारी वार को रोक दिया जा सके।

इस सुलह में आज़म खान से लेकर लालू प्रसाद और कई लोग कोशिश कर चुके हैं लेकिन कहीं न कहीं अखिलेश खैमे के राम गोपाल और मुलायम खैमे के अमर सिंह रोड़ा बनते नज़र आ रहे हैं हालाँकि विवाद की जड़ माने जा रहे शिवपाल ने केंद्रीय समिति में जाने से लेकर इस्तीफ़ा देकर अलग होने तक का त्याग का एलान कर दिया।

इसमें शुक्रवार को एक प्रयास शिवपाल ने फिर लचीला पन अपनाते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के घर जा कर किया और इसमें कुछ कामयाबी भी मिली अखिलेश-आज़म मुलायम के घर पर मीटिंग के लिए तैयार भी हो गए लेकिन भी बिल्ली ने रास्ता काट दिया होगा शायद। अमर सिंह ने भी सुबह से ही विक्रमादित्य मार्ग का चक्कर लगाना शुरू कर दिया और शिवपाल -मुलायम का फेवर करते हुए अखिलेश के खिलाफ बोल दिया अमर सिंह ने कहा कि शिवपाल सिंह ने अखिलेश को उस समय से पाला है, जब वह चार वर्ष के थे। शिवपाल ने यह तो नहीं सोचा होगा कि कोई मतलब है।

मुलायम सिंह पार्टी को खड़ा करने में जुटे थे, इसलिए धर्म पिता का शिवपाल ने ही निभाया है। अमर सिंह का कहना है कि मुलायम इस समय सबसे ज्यादा अकेले और बेहैसियत हैं और उन्हें सहारे की आवश्यकता है। वहीं, अमर सिंह कटाक्ष करने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने कहा कि जो लोग अभी तक दागी थे, वह सुबह हलफनामा देने के साथ साफ हो गए।

मुख्यमंत्री ने कभी मुझे भाजपा का एजेंट का और कभी दलाल तक कह डाला, लेकिन अखिलेश को सोच समझकर बोला चाहिए। उधर राम गोपाल ने मोर्चा संभाला और खबर आने लगी चुनाव आयोग में शपथ पात्र देने के लिए राम गोपाल की तैयारी पूरी। सीधी सी बात है दिल्ली में सपा के सूत्रधार होने का सेहरा अपने सिर पर रखने की चाह रखने वाले राम गोपाल अमर सिंह को किसी भी सूरत में क़ुबूल नही कर सकते।

इन सबमे कहीं न कहीं भूमिका नरेश अग्रवाल की भी नज़र आती है और इस परि -वार में उनका भी नाम आया है यहाँ तक कहा गया की दाल बदल में माहिर नरेश अग्रवाल भी हवा दे रहे। अगर इस विवाद पर ध्यान दिया जाये तो अखिलेश यादव की भूमिका गुंडे माफिया मुक्त छवि की बनकर उभर आ रही वहीँ शिवपाल की भूमिका इससे अलग बन गयी अपने बच्चों के राजनैतिक भविष्य को लेकर चिंतित ज़्यादातर नेता अखिलेश यादव के समर्थन में दिखे वहीँ अखिलेश यादव की साफ़ छवि लेकर चुनावी मैदान में जाने की तैयारी करते हुए कुछ और उनके साथ हो लिए। इससे यह भी लगता है कि पिता पुत्र की इस सियासी जंग में अखिलेश उन लोगों के लिए रौशनी की किरण नज़र आये जो पिता अपने पुत्र के राजनैतिक जीवन को लेकर चिंतित हैं।