बेंगलुरु छेड़खानी का ज़िम्मेदार कौन?

भारत समेत पुरे विश्व ने नववर्ष की खुशियाँ मनाईं। जहाँ हम सब आने वाले खुशहाल नववर्ष की कामना कर रहे थे वही एक दुखद घटना ने पुरे देश को चौंका दिया और हम सब को शर्मिंदा कर दिया। असभ्य दरिंदों का एक समूह निकला जिसने बेंगलुरु की सड़कों पर महिलाओं के साथ छेड़ खानी की।

ये खबर चारों ओर आग की भाँती फैल गई और राजनेताओं और अभिनेताओं ने इस पर टिप्पणियां भी कीं। कुछ लोगों ने महिलाओं को दोष दिया, कुछ ने उनके वस्त्र को तो कुछ ने पुरुषों को। यहाँ तक कि पुलिस और पश्चिमी संस्कृति पर भी ऊँगली उठाई गई।

हमारे सामने बहुत सी टीवी चर्चाएँ आईं जिनमें लोगों ने अपनी राय दी और दूसरों की राय की आलोचना की। ट्विटर, फेसबुक, वाटस एप और दुसरे सामाजिक मीडिया प्लेटफार्म पर हम सब ने इस पर खूब चर्चा की।

किन्तु वास्तव में इस सब का ज़िम्मेदार कौन है? लोगों की सोच, शराब, वे महिलाएं जो वहां थीं, स्कर्ट या फिर संस्कृति?

प्रश्न टेढ़ा है और उसका उत्तर भी। इन सारे प्रश्नों का कोई एक सीधा उत्तर नहीं है। यह बात चाहे कितनी ही कड़वी क्यूँ न लगे, किन्तु हमें अपनी ग़लतियों को स्वीकार करना होगा। हम इसका विरोध करेंगे, लड़ेंगे और शिकायत करेंगे, किन्तु वास्तविकता यही है कि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ महिला और पुरुष के साथ समान व्यवहार नहीं होता है।

पुरुषों को पूरी आज़ादी है कि वे जो भी चाहे करें, और दोषी सदैव महिलाओं को ठहराया जाता है। मुझे यह देख कर प्रसन्नता हुई कि अभिनेताओं ने इस घिनौने कार्य की आलोचना की किन्तु साथ ही मुझे हैरत भी है कि वे फिल्म उद्योग में बढ़ावा दिए जाने वाले इसी कार्य के प्रति असंवेदनशील क्यूँ है?

एक प्रसिद्ध अभिनेता ने छेड़खानी करने वाले इन पुरुषों को हैवान कहा, जोकि वास्तव में वे हैं भी। किन्तु स्वयं बॉलीवुड फिल्में आज के पुरुषों को क्या बना रही हैं? एक सज्जन पुरुष जो महिलाओं का सम्मान करता है या एक यौन दरिंदा जो महिलाओं को केवल प्रयोग में लाइ जाने वाली वस्तु समझता है? मस्ती जादे, क्या कूल हैं हम ३, ग्रेट ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्में – ये आने वाली पीढ़ी और उसके बाद वाली पीढ़ी के माता पिता बन्ने वालों को क्या सिखा रही हैं? क्या ऐसी फिल्में पुरुषों को यह सिखाती हैं कि वे महिलाओं का सम्मान करें और जानें कि महिलाएं सिर्फ यौन सम्बन्ध के लिए प्रयोग में लाइ जाने वाली एक वस्तु नहीं है?

हमारी फिल्में, रियलिटी शोज और बहुत से टैलेंट हंट प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ये हमारी सोच को ऐसा बना रहे हैं कि हम लोगों को उनके रूप और पहनावे से आंकें। सबसे टाइट और छोटा कपड़ा (महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए) समृद्धि और आधुनिकता का प्रतीक समझा जाता है। एक ओर जहाँ इस प्रकार के पहनावे को बढ़ावा दिया जाता है वही दूसरी ओर ऐसा माहोल बनाया गया है जिससे ये संकेत मिले कि ऐसे पहनावे के लोग “खाली” और “उपलब्ध” हैं।
हम कैसे इन सब बातों से मुंह मोड़ कर महिला सम्मान और उसकी सुरक्षा का दावा कर सकते हैं और ट्विटर पर मगरमच्छ के आंसू बहा सकते हैं?

हम इस बात को स्वीकार करें या न करें, वह पूरी पार्टी ही पश्चिमी संस्कृति की एक नक़ल थी। पश्चिमी संस्कृति को उसकी चमक धमक के साथ स्वीकार कर लेने की हमें बेहतरीन शिक्षा दी गई है। जब हम पश्चिमी संस्कृति के सकारात्मक पहलुओं को स्वीकार कर रहे हैं तो साथ आने वाले उसके नकारात्मक पहलुओं की शिकायत क्यूँ करने लगते हैं?

हमें सिर्फ तथाकथित पश्चिमी आज़ादी और समृधि के बारे में ही खबर दी जाती है, किन्तु हम शायद ही कभी पारिवारिक मूल्यों के नष्ट होने, महिलाओं को प्रयोग की एक वस्तु बनाने और सामान्यता के नाम पर उनपर हावी होने की बात करते हों। आज़ादी के नाम पर महिलाओं को पोल नृत्य करवाया जाता है तथा दर्शकों के मनोरंजन के लिए उन्हें चीयर लीडर्स बनाकर नृत्य करवाया जाता है, रेजर ब्लेड बेचने में, कार बेचने में और पता नहीं क्या क्या बेचने में उनका प्रयोग किया जाता है, ये आज़ादी है या महिला को केवल प्रयोग की एक वस्तु बनाना है?

क्या हमारे मुख्यधारा मीडिया ने इस बात पर चर्चा की कि ६,८३,००० वयस्क अमेरिकी महिलाओं का प्रतिवर्ष बलात्कार होता है। इस हिसाब से ये ५६,९१६ बलात्कार प्रतिमाह, १८७१ प्रतिदिन, ७८ प्रति घंटा और १.३ प्रति मिनट हुए। और केवल १६% बलात्कारों की ही पुलिस को सुचना दी जाती है।

असल मुद्दा ये है कि या तो हम ये स्वीकार कर लें कि जो संस्कृति हम अपना रहे हैं वह हमें बर्बादी की ओर घसीट रही है या हम इसको जैसे तैसे स्वीकार कर लें और दूसरों पर आरोप लगाना छोड़ दें।

साथ ही शराब के विज्ञापन भी अब टेलीविज़न पर आराम से दिखाए जाने लगे हैं। फिर चाहे वे वर्तमान की फिल्मों के दृश्य हों या प्रसिद्ध अभिनेताओं का पानी की बोतलें और म्यूजिक सी डी बेचना हो। जब हम इन सब को अपनी संस्कृति का भाग मानते हैं तो बाद में इनके परिणाम पर रोना कैसा? सीधी तरह से कहा जाए तो आप एक शराबी से क्या आशा करते हैं – महिलाओं के प्रति सम्मान?

इस समाज का हिस्सा होने के नाते हमको इस लज्जाजनक घटना की ज़िम्मेदारी लेनी होगी।  हम अपने कर्तव्यों को निभाने में असक्षम रहे हैं, न केवल बेंगलुरु में, बल्कि अपने टेलीविज़न पर, सिल्वर स्क्रीन पर, समाचार पत्रों में, सामाजिक मीडिया पर और सामाजिक संबंधों में भी।