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ट्रंप की विजय – रूस की जीत और अरब की हार
अमेरिका के नए राष्ट्रपति ट्रम्प का विरोध करने वाला सऊदी अरब जो कि सीरिया और उसके मित्र देशों को धूल चटाना चाहता था, इस समय अमेरिकी चुनावों का सबसे बड़ा पराजित लग रहा है और इसी के साथ सीरिया में अब न चाहते हुए भी उसका समय समाप्त हो रहा है।
 
ट्रम्प और “मास्को तथा रियाध”
ट्रम्प के वाइट हाउस में पहुच जाने के पश्चात् अब अमेरिका का झुकाव सऊदी अरब से अधिक रूस की ओर होगा तथा ये बात रियाध के हित में नहीं है। स्पष्ट है कि किसी प्रकार से भी अरब रूस का हम पल्ला नहीं है किन्तु सीरिया के मामले में रियाध पर ध्यान देना आवश्यक है। अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीरिया में रियाध का एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में प्रयोग किया। अरब ने दाएश और उस जैसे दुसरे वहाबी विचारधारा पर चलने वाले समूहों का साथ दिया और अमेरिका ने उसकी इन प्रतिक्रियाओं पर पर्दा डाला।
इसी प्रकार सीरिया में रूस की भूमिका को कम करने और ईरान और हिजबुल्लाह का मित्र होने के कारण बशारुल असद की सरकार को उखाड़ फेंकने के सऊदी अरब के प्रयासों पर भी अमेरिक ने पर्दा डाला
 
ट्रम्प और सऊदी अरब
ट्रम्प की जीत के कारण दक्षिणपंथी दृष्टिकोण रखने वालों का अमेरिका और विश्व भर में समर्थन हो रहा है। ये मुद्दा रियाध के लिए एक चेतावनी जैसा है। सऊदी अरब के लिए ट्रम्प की नज़र संकीर्ण है। ट्रम्प ने अपने चुनावी अभियान के आरंभ में ही ये कह दिया था कि वह फारस की खाड़ी के आस पास के अरबी देशों और विशेष रूप से सऊदी अरब को, इस शर्त पर कि वे अमेरिका के आदेशों का पालन न करें, दण्डित करेगा। इसी प्रकार ट्रम्प ने अपनी एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कहा था कि अगर सऊदी अरब और फारस खाड़ी के आस पास के अरब देशों ने सीरिया में अपनी सेनाओं को भेज कर दाएश के विरुद्ध लड़ाई नहीं की तो बाद में वह इन देशों को आर्थिक दंड देगा। इसी प्रकार उसने कहा कि अगर अमेरिका अरब का साथ देना छोड़ दे तो अरब तहस नहस हो जाए। अपनी कार्य अवधि आरम्भ होने से पहले ही ट्रम्प के सऊदी अरब पर किए जाने वाले हमले सीरिया के हित में है तथा ये हमले अपने विरोधियों से मुकाबला करने में सीरिया का  पलड़ा भारी कर देंगे। अमेरिका के नए राष्ट्रपति का कहना है कि सीरिया के लिए कोई दूसरा स्थानधारक न होने के कारण वर्तमान सरकार ही जारी रखी जाए। क्यूंकि बशारुल असद के हटने या उसे हटाने से अरब की इच्छा अनुसार दाएश और जिब्हे अल’नुसरह जैसे तक्फीरी समूह सत्ता में आ जाएँगे जो कि अमेरिकी दक्षिणपंथियों के हित में नहीं हैं।
वाशिंगटन के स्वीकार करने के पश्चात् भी कि एशियाई समूहों को दाएश और जिब्हे अल’नुसरह  जैसे आतंकवादी समूहों से अलग करना कठिन है, ट्रम्प की उपस्थिति एक प्रकार से असद के हित में है, क्यूंकि ट्रम्प सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप करने के विरुद्ध है। उसने अपने पिछले बयानों में खुल कर कहा था कि विजयी होने की सूरत में वह सीरिया से जंग नहीं करेगा बल्कि दाएश के साथ जंग करने में पूरा ध्यान लगाएगा।
अब जबकि सारी शक्ति एक ही डेमोक्रेट के हाथ में आ गई है तो वर्तमान में रियाध और वाशिंगटन के सम्बन्ध अरब की इच्छा अनुसार नहीं हैं। अरब के विरुद्ध जासता कानून (JASTA: Justice Against Sponsors of Terrorism Acts) का अनुमोदन सारी बातों का प्रमाण है। परिणामस्वरूप ट्रम्प के वाइट हाउस पहुच जाने के पश्चात् अरब और अमेरिका के सम्बन्ध के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। विशेष रूप से जब ट्रम्प ने अरब को  दूध दें वाली गाय के समान बताया है जिसका दूध सूख जाने के पश्चात् उसकी बलि चढ़ा दी जाती है। अरब को चाहिए कि अमेरिकी सहायता का मुआवज़ा लौटाए
 
ट्रम्प और रूस
दूसरी ओर रूस ट्रम्प की जीत में सबसे पहला विजयी माना जा रहा है। विशेष रूप से तब जब डेमोक्रेटिक सरकार के होते हुए वाशिंगटन और मास्को के सैन्य और राजनीतिक सम्बन्ध ठन्डे पड़ चुके थे, विशेष रूप से तब जब अमेरिका ने सीरियाई बैठक को निलंबित करने का निर्णय लिया था और इसके चलते अमेरिका और रूस सरकार का आपसी तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। किन्तु ट्रम्प रूस के मामले में डेमोक्रेट से विभिन्न दृष्टिकोण रखता है। लोगों को ये भी मालूम होगा कि डेमोक्रेटिक पार्टी के ईमेल का राज़ फाश करने के कारण रूस भी ट्रम्प की जीत में भागीदारी है। रूस के इस कार्य का परिणाम ये हुआ कि अमेरिकी जनता का क्लिंटन पर से भरोसा उठ गया। दूसरी ओर ट्रम्प ने रूस के साथ किसी भी प्रकार की सांठ गांठ का इनकार किया। किन्तु जोर देते हुए कहा कि अगर वह वाइट हाउस तक पहुचते हैं तो रूस के साथ रचनात्मक सम्बन्ध बनाए। इसी प्रकार रूस के बारे में उसके भाषण लचीलेपन के साथ थे। उसने अपने बहुत से भाषणों के बीच में पुतिन की बहुत सी सकारात्मक विशेषताएं बताईं।