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ट्रम्प की “नई बहादुर दुनिया”
वर्ष १९३२ में ऐल्दास हक्सली ने एक पूर्वानुमान किया था: “जिस वस्तु को हम पसंद करते हैं वही हमें मिटा देती है।“ उन्होंने अपनी उपन्यास “नई बहादुर दुनिया” में एक ऐसी मानव जाति का विवरण किया है जो वर्ष २५४० तक अज्ञान के कारण मिट चुकी होगी, अभिलाषा मनोरंजन का लगातार साधन होगी तथा तकनीकी महारत और भौतिक वस्तुओं का एक तूफ़ान होगा। वर्तमान ही में डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में विजयी होना दर्शाता है कि हक्सली का पूर्वानुमान ५०० वर्ष पहले ही पूरा हो गया है।
लम्बे समय से सामान्य अमेरिकी समाज का बौद्धिक विचारों से कोई लेना देना नहीं रहा है। असीमित रचनात्मकता और बेलगाम पूंजीवाद के नाम पर समतावाद और खुली अर्थव्यवस्था के नारे सामने आ रहे हैं। आगे बढ़ने के लिए जिस वस्तु की सबको आवश्यकता है वह हिम्मत और दृढ़ता है।
कभी सोवियत संघ जैसे देशों के लिए ये आकर्षिक प्रस्ताव था जो कि और स्पष्ट रूप से जॉर्ज ओरवेल की दिस्तोपियन (dystopian) प्रजाति उपन्यास “१९४८” में दर्शाया गया है। एक ऐसा देश जहाँ सरकारी नियंत्रण सामाजिक रचनात्मकता को रौंद डालता हो, वहां अमेरिकी रचनात्मकता एक सपने जैसी वस्तु लगती है।
किन्तु ओरवेल की दुनिया में राजनीतिक दबाव तथा सिस्टम के भीतर का विपक्षी आन्दोलन आगे बढ़ रहा है, और अंततः सोवियत संघ को रौंदने की ओर आगे बढ़ रहा है। जब अपने कार्य में व्यस्त और चिंताहीन लोगों के ध्यान को विचलित चीज़ें बांटेंगी, तो धीरे धीरे उनका प्रतिरोध समाप्त हो जाएगा। अंततः वे ज्ञान और कौशल के अभाव से प्रभावित होकर न चाहते हुए भी उस जीवन शैली को छोड़ नहीं पाएंगे। दुसरे शब्दों में, पुर्वीय सोवियत संघ में नागरिकों के पास ये उम्मीद थी कि कुछ कम अप्रिय ही सही किन्तु नए प्रकार के कारागार बनाए जाएँगे, किन्तु जिस समस्या का अमेरिकी जनता आज सामना कर रही है, उससे पीछा छुड़ाना अत्यंत कठिन है।
अमेरिकी संस्कृति उद्योग एक लम्बे समय से देश की राजनीति का कर्ज़दार है, क्यूंकि उसका हॉलीवुड में यथार्थपरक किरदार है। राजनेताओं को भ्रष्टाचार से दूर और बेकसूर व्यक्ति दिखाया जाता है।उदाहरण के तौर पर फिल्म “मिस्टर स्मिथ इज़ गोइंग टू वाशिंगटन” में जेम्मी स्टेवार्ट (१९३९), “सिटीजन केन” में ओर्सोन विल्ज़(१९४१), और “कैंडिडेट” में रोबर्ट रुथ्फोर्ड (१९७२)।
श्यामला चेहरे वाले युवा जॉन एफ कैनेडी के विजयी होने के पश्चात् प्रथम बार हॉलीवुड के एक चेहरे ने वाइट हाउस में प्रस्थान किया। वर्ष १९६० मेरी अमेरिकी घरों में कैनेडी के चित्र बटा करते थे और उस चित्र में उनके किनारे अधिक प्रसिद्ध और कम आकर्षित व्यक्ति रिचार्ड नेक्सोन खड़े होते थे। कैनेडी ने एक आदर्श और चरवाहे के प्रकार लोगों के दिलों को कैद कर लिया था। हालाँकि वह अज्ञान का प्रतीक नहीं थे बल्कि इसके विपरीत उन्होंने वर्ष १९६३ में कहा था:”अज्ञान और अशिक्षा हमारी आर्थिक और सामूहिक व्यवस्था को हार की ओर ले जा रही है।“
अमेरिकी टीवी स्क्रीन का एक और आकर्षक चेहरा रोनाल्ड रेगन था। वह एक वास्तविक अभिनेता था जिसने एक चरवाहे के रूप में अभिनय किया। किन्तु जब शुद्धता और शिक्षा का विषय आता था तो उसका दृष्टिकोण जॉन एफ कैनेडी के बिलकुल विपरीत हुआ करता था। वाइट कार्यकर्ताओं के हित में उनका आर्थिक समर्थन करने के कारण उसने मिलियन लोगों को आश्वस्त कर लिया कि “निचली सर्कार” राजनीती अर्थात शिक्षा और विकास से संबंधित संघीय प्रोग्रामों को कैंसिल करने से अमेरिकियों की उम्मीदें वापस लेकर आएगा।
अपने हालीवुदी कौशल को प्रयोग में लाते हुए रेगन ने एक राष्ट्रपति के रूप में अपने रोल को बखूबी निभाया। परमाणु जंग जो कि “आपसी आश्वासित विनाश” रणनीति के नाम से जानी जाती थी, उसको समाप्त करने के लिए रेगन की “सामरिक रक्षा पहल” रणनीति का उपनाम “अभिनेताओं की जंग” पड़ा। रिपब्लिकन का प्रतीक होते हुए रेगन की स्थिर हालत उसकी क्षमताओं, एक सताए हुए चरवाहे और अभिनेत्री के आकर्षण के साथ, पर निर्भर थी। फिर भी भाग्य की बात है कि उसने वैसी ही भूमिका निभाई और हर प्रकार से शीत युद्ध में मिखाइल गोर्बाचेफ़ से विजयी हुआ, वह नेता जिसके सोवियत संघ के सुधार के प्रयासों ने उसकी बर्बादी को और तेज़ कर दिया।
चुनावी कैंपेन के एक रणनीतिक जेम्स कोर्वेल ने बिल क्लिंटन(जिनको  कैनेडी की तरह दक्खिनी जनता का समर्थन प्राप्त था) के राष्ट्रपति पद के लिए एक वाक्य बनाया था – “ये अर्थव्यवस्था है, मूर्ख”। एक ऐसा सरल वाक्य जो आज तक प्रयोग में लाया जा रहा है। अभी भी इस वाक्य को सटीक रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था, जोकि मूर्खता की ओर बढ़ रही है, के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है।
वर्ष २००३ में अमेरिकी जॉर्ज बुश के लिए तैयार हो रहे थे। एक राजकुमार और सबको पसंद आने वाला व्यक्ति। उसके वंश-वृक्ष में उसके पिता का शाही रक्त था जो कि टेक्सास के एक सरल से व्यक्ति थे। बुश वैसे तो कोई सिनेमा स्टार नहीं था किन्तु जंग को प्रोत्साहन देने के लिए किए जाने वाले प्रचार के लिए जाना जाता था।
आजकल गतिविधियाँ एक नया मोड़ ले रही हैं इस कारण राजनीति भी बदल गई है। टेलीविज़न शो से लेकर गर्मियों की ब्लॉकबस्टर फिल्में और सोशल मीडिया तक, बहुत से लोग इन चीज़ों में व्यस्त हैं विशेष रूप से अमेरिका में जहाँ बिना फ़िल्टर हुए, तुरंत मिल जाने वाली सब चीज़ें सदैव उपस्थित है। विस्तृत ज्ञान तथा कठिन बहसों की चाहत से अधिक अब दोस्तों, लाइक्स और फालोवर्स की चाहत अधिक है।
अब ट्रम्प आ रहे हैं। इस पूर्व टेलीविज़न स्टार को अच्छे से मालूम है कि विरोध प्रदर्शन, “राजनीतिक डिजाईन” नाम से १४० अक्षरों के वाक्यों से कैसे क्रोधित जनता को नियंत्रण में रखना है तथा कैसे उनको क्रोधित करना है। ट्रम्प जिसने स्वयं कहा था कि वह “ट्रम्प टीवी” प्रारंभ करेगा (चुनाव के दौरान जब लग रहा था की वह हार जाएगा), उसने इस चुनावी विजय का श्रेय सोशल मीडिया को दिया है।
ट्रम्प के कुछ मतदाता कह रहे हैं कि समान विचारों ने उनको इस कार्य के लिए प्रोत्साहित किया है। ये समान विचार “कल्याण और ऋण राहत” तथा “प्रवास में मज़बूत सुधार” नामी बयानों से पैदा हुए हैं। किन्तु अगर देखा जाए तो इन सारे बयानों में कोई वास्तविकता नहीं थी जबकि वास्तव में  इन में एकजुटता लाइ जा सकती थी।
मतदाताओं ने जिस प्रकार मत दिया है, वह एक शिष्य का अपने गुरु को मत देना है। एक सत्तावादी व्यक्ति जो बिना किसी विचार के लोगों को निर्वासित कर देगा। मतदाताओं का मानना है कि ट्रम्प उनके गर्व से भरे गान “अगर सारी वस्तुएं सफ़ेद और काली नहीं हैं, तो मैं कहूँगा की नरक क्यों नहीं है?” को दोबारा आरंभ करेगा। मतदाता उस समय लौटे जब गोरे चरवाहे जीत चुके थे।
ट्रम्प की नियुक्ति के पश्चात्, कि जिसने एक सफ़ेद जातिवादी को अपना वरिष्ठ सलाहकार और रणनीतिक नियुक्त किया है, अमेरिका ओरवेल के क्षेत्र से भी आगे निकल जाए। संभव है ये हानिकारक हो किन्तु उम्मीद के बादल अभी भी दिखाई दे रहे हैं। अंततः एक आन्दोलन आएगा और इस सरकार का तख्ता पलट देगा। ट्रम्प का दौरान संभव है नव-फासीवाद का नया दौर हो, संभव है वह एक ऐसा अमेरिका बनाए जहाँ लोगों के लिए व्यवसाय की कमी हो और दूसरी ओर मतदाता सोशल मीडिया पर झूटी खबरें फैलाने में व्यस्त हों। धीरे धीरे लोग वास्तविकता और आभास में अंतर करने वाली अपनी बची कुची क्षमता को भी खो देंगे।